चंडीगढ़.
IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया के विरोध में बैंक के अधिकारी और कर्मचारी दो दिवसीय देशव्यापी भूख हड़ताल पर हैं। सोमवार, 2 नवंबर को सुबह 10 बजे शुरू हुई यह भूख हड़ताल मंगलवार शाम 6 बजे तक चलेगी।
बैंक कर्मचारी संगठनों का दावा है कि इस आंदोलन में देशभर के 20 हजार से अधिक कर्मचारी शामिल हैं। कर्मचारियों ने सरकार से निजीकरण की प्रक्रिया रोकने और बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का दर्जा बरकरार रखने की मांग की है। बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के नेशनल प्रेसिडेंट सौरभ कुमार ने कहा कि IDBI बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की हिस्सेदारी है। अब बैंक की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी कंपनी को बेचने की तैयारी की जा रही है। कर्मचारियों का विरोध इसी प्रस्तावित फैसले को लेकर है।
सरकार और बैंक मैनेजमेंट से नहीं मिला ठोस आश्वासन
सौरभ कुमार ने बताया कि कर्मचारियों ने अपनी चिंताओं से सरकार को कई बार पत्र और ईमेल के माध्यम से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। बैंक मैनेजमेंट के साथ भी कई दौर की बातचीत हुई, मगर वहां से भी कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया। ऐसे में कर्मचारियों को भूख हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा। उन्होंने कहा कि यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंकिंग यूनियंस सहित विभिन्न बैंक कर्मचारी संगठनों ने आंदोलन को समर्थन दिया है। कई ट्रेड यूनियनें भी कर्मचारियों के पक्ष में आई हैं। इसके अलावा कई सांसदों ने निजीकरण के विरोध में पत्र लिखकर अपना समर्थन जताया है।
छह साल से लगातार मुनाफे में चल रहा बैंक
बैंक कर्मचारियों का कहना है कि IDBI बैंक पिछले छह वर्षों से लगातार मुनाफा कमा रहा है। सौरभ कुमार के मुताबिक, बैंक ने पिछले वित्त वर्ष में 9,500 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा दर्ज किया। कर्मचारियों का सवाल है कि जब बैंक अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों है? उनका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करने, छोटे कारोबारियों को कर्ज देने तथा विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं। निजीकरण से आम लोगों, गरीब और मध्यम वर्ग के ग्राहकों के साथ-साथ बैंक कर्मचारियों के भविष्य पर भी असर पड़ सकता है।
आरक्षित वर्ग और दिव्यांग कर्मचारियों के भविष्य पर चिंता
सौरभ कुमार ने कहा कि बैंक के निजीकरण की स्थिति में कर्मचारियों के रोजगार और भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े होंगे। विशेष रूप से आरक्षित वर्ग और दिव्यांग कर्मचारियों के रोजगार के अवसरों तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में रोजगार के अवसर और सामाजिक प्रतिनिधित्व बनाए रखना जरूरी है।
कर्मचारियों की तीन प्रमुख मांगें
IDBI बैंक के कर्मचारियों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली, बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए। दूसरी, सरकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी छह प्रतिशत बढ़ाए, ताकि बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का दर्जा बहाल किया जा सके। तीसरी, यदि सरकार निजीकरण का फैसला वापस नहीं लेती है तो कर्मचारियों को किसी दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में स्थानांतरित होने का विकल्प दिया जाए। कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं की गई तो 3 नवंबर के बाद आंदोलन के अगले चरण की घोषणा की जाएगी।
बैंक यूनियनों ने भी निजीकरण पर उठाए सवाल
यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंकिंग यूनियंस के प्रतिनिधियों ने भी IDBI बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के आंदोलन को समर्थन दिया है। उनका कहना है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य आम जनता, गरीबों, मजदूरों और मध्यम वर्ग तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना था। यूनियन प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बड़ी आबादी को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं, तो मुनाफे में चल रहे IDBI बैंक के निजीकरण का फैसला क्यों किया जा रहा है? उनके मुताबिक, बैंक पिछले पांच वर्षों में करीब 30 हजार करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा चुका है। ऐसे में सरकार को निजीकरण के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए। फिलहाल, IDBI बैंक के अधिकारी और कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। अब सरकार के रुख पर नजर है। कर्मचारियों ने साफ किया है कि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।



